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Wednesday, December 3, 2008

पेड़


खेतों पर बगीचों में
या सड़कों के किनारे,
लगे वृक्ष
कितनें अच्छे लगते हैं,
वनों की तो बात ही और है!
चारों ओर वृक्ष ही वृक्ष हैं।
छोटे बड़े,नये पुरानें
भाँति-भाँति के वृक्षों को देख कर
बड़ी प्रसन्नता होती है।
लेकिन मानवता उन से बेखबर सोती है।

वृक्षों की बात करते ही
उनके लाभ याद आ जाते हैं।
उन की छाया देती है सकून
हमे देते हैं वे फल और फूल
लकड़ी जो हमे पालती है और
अंत में चिता तक साथ देती है।
बदले में भला वह क्या हम से लेती है।
आओ नया वन उगाएं।
इस धरती को स्वर्ग -सा सजाएं।



छोटे-ब
बड

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Saturday, July 19, 2008

कोई नही बचा !

मौत से कोई नही बचा।
जो भी आया वह गया
मौत हर पल पीछे
पर हमे क्या पता
कब वार कर दे।

मौत से कोई बही बचा
यहाँ तक की वक्त
ना पता मरनें का।
पता नही
कब बुलाएगा ऊपर वाला?
पता नही कब यमराज लेनें आएगा?

मौत से कोई नही बचा।
कब वह हमें लेकर जाएगा?
अपनी अदालत खड़ी करेगा
और हमारे नर्क-स्वर्ग
जानें का फैसला करेगा।

मौत से कोई नही बचा।

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जब मन मे कोई तरंग उठती है तो उसे समेटने कि एक छोटी सी कोशिश करता हूँ................

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